Immovable Property Intimation Form एक आधिकारिक घोषणा है जिसमें सरकारी या संस्थागत कर्मचारी अपनी खरीदी या बेची गई अचल संपत्ति की जानकारी अपने विभाग को देते हैं। यह फॉर्म प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन के बाद निर्धारित समय में जमा करना अनिवार्य होता है और ₹50 लाख से अधिक की संपत्ति पर Section 194-IA के तहत 1% TDS लागू होता है।
Immovable Property Intimation Form क्या होता है?
Immovable Property Intimation Form एक आधिकारिक घोषणा (Official Declaration) होती है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति द्वारा खरीदी या बेची गई प्रॉपर्टी की पूरी जानकारी संबंधित विभाग या संस्था को दी जाती है। सरल शब्दों में समझें तो यह एक सूचना पत्र होता है, जो यह बताता है कि आपने कोई जमीन, फ्लैट, मकान या अन्य अचल संपत्ति खरीदी या बेची है और उसकी सभी वित्तीय व कानूनी जानकारी दर्ज कर दी गई है।
आज के समय में प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन केवल रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रहता। सरकार और कई संस्थाएं यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि हर बड़ी वित्तीय डील पारदर्शी तरीके से रिकॉर्ड में आए। इसी उद्देश्य से यह फॉर्म भरा जाता है, ताकि भविष्य में आय, संपत्ति और टैक्स से जुड़ी जानकारी में किसी प्रकार का अंतर या संदेह न रहे।
इस फॉर्म का मुख्य उद्देश्य
प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन का रिकॉर्ड बनाए रखना
सरकारी विभागों और संस्थाओं के पास कर्मचारियों की संपत्ति का सही और अपडेटेड रिकॉर्ड होना जरूरी होता है। इससे यह स्पष्ट रहता है कि किसी व्यक्ति ने कब और किस मूल्य पर प्रॉपर्टी खरीदी या बेची।
टैक्स कम्प्लायंस सुनिश्चित करना
भारत में प्रॉपर्टी खरीद-फरोख्त सीधे आयकर नियमों से जुड़ी होती है। जब प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन की जानकारी समय पर दी जाती है, तो भविष्य में टैक्स रिटर्न, टीडीएस और कैपिटल गेन की गणना आसान हो जाती है और नोटिस या पेनल्टी की संभावना कम हो जाती है।
ब्लैक मनी पर नियंत्रण
रियल एस्टेट सेक्टर को हमेशा से उच्च मूल्य के लेन-देन के कारण संवेदनशील माना गया है। इस फॉर्म के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रॉपर्टी खरीदने में उपयोग किया गया पैसा वैध स्रोतों से आया है और पूरा ट्रांजैक्शन पारदर्शी तरीके से दर्ज हो।
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किन लोगों को यह फॉर्म भरना पड़ता है?
आमतौर पर यह फॉर्म निम्न लोगों के लिए अनिवार्य होता है:
सरकारी कर्मचारी (Government Employees)
पीएसयू (PSU) कर्मचारियों
कुछ निजी संस्थानों के कर्मचारी, जहाँ एसेट डिक्लेरेशन अनिवार्य होता है
जब भी ये कर्मचारी कोई प्रॉपर्टी खरीदते या बेचते हैं, उन्हें निर्धारित समय के भीतर अपने विभाग को इसकी सूचना देना आवश्यक होता है। यह प्रक्रिया उनकी आय, संपत्ति और वित्तीय गतिविधियों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए की जाती है।
भारत में प्रॉपर्टी खरीदना या बेचना कभी भी सिर्फ सही घर ढूँढने, कीमत तय करने और रजिस्ट्री पर साइन करने तक सीमित नहीं रहा है। पिछले चार दशकों में रियल एस्टेट सेक्टर को करीब से देखने के बाद—जहाँ पहले जमीन के रिकॉर्ड मैनुअल होते थे और आज पूरी प्रक्रिया डिजिटल रजिस्ट्रियों और टैक्स ट्रैकिंग सिस्टम से जुड़ चुकी है—मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि आज के समय में डॉक्यूमेंटेशन उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है जितनी खुद प्रॉपर्टी। आज खरीदार और विक्रेता जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह डील में नहीं बल्कि डील के बाद होने वाली कागजी प्रक्रिया में होती है।
ऐसा ही एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है Immovable Property Intimation Form, जो अचानक चर्चा में आ गया है। कुछ समय पहले तक यह एक ऐसा कम्प्लायंस स्टेप था जिसे बहुत से लोग या तो नजरअंदाज कर देते थे या पूरी तरह समझ नहीं पाते थे। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। सख्त इनकम टैक्स मॉनिटरिंग, डिजिटल प्रॉपर्टी डेटाबेस और ऑटोमेटेड फाइनेंशियल रिपोर्टिंग सिस्टम के कारण अब हर प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन सीधे सरकारी विभागों की नजर में आ जाता है। इसका मतलब यह है कि जैसे ही किसी प्रॉपर्टी का स्वामित्व बदलता है, उस ट्रांजैक्शन का पूरा वित्तीय रिकॉर्ड कम्प्लायंस सिस्टम का हिस्सा बन जाता है।
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अपने अनुभव में, जहाँ मैंने वर्षों तक खरीदारों, निवेशकों और सरकारी कर्मचारियों को सलाह दी है, मैंने एक सामान्य पैटर्न देखा है—लोग प्रॉपर्टी खरीदने की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान देते हैं, लेकिन खरीद के बाद की जिम्मेदारियों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें लगता है कि रजिस्ट्री पूरी होने और पजेशन मिलने के बाद प्रक्रिया खत्म हो गई। जबकि सच्चाई यह है कि रजिस्ट्री केवल कम्प्लायंस यात्रा का मध्य बिंदु है। अंतिम चरण है इस ट्रांजैक्शन को सही तरीके से घोषित करना, ताकि आपके वित्तीय रिकॉर्ड, टैक्स प्रोफाइल और एसेट डिक्लेरेशन पूरी तरह साफ और पारदर्शी रहें।
भारत में रियल एस्टेट सबसे ज्यादा जांचे-परखे जाने वाले निवेश क्षेत्रों में से एक है। प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन सीधे इनकम टैक्स रिपोर्टिंग, टीडीएस कटौती, कुछ कर्मचारियों के वार्षिक एसेट डिक्लेरेशन और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन की गणना से जुड़ा होता है। यदि कोई छोटा सा कम्प्लायंस स्टेप भी छूट जाए, तो भविष्य में नोटिस, पेनल्टी या प्रॉपर्टी बेचने और लोन लेने में देरी जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं। आज जिन टैक्स नोटिस से लोग घबराते हैं, उनमें से कई सही समय पर सही डॉक्यूमेंटेशन करने से आसानी से टाले जा सकते थे।
इन्हीं समस्याओं से बचाने के लिए Immovable Property Intimation Form बनाया गया है। यह एक आधिकारिक घोषणा होती है जिसमें प्रॉपर्टी खरीद या बिक्री की पूरी जानकारी दर्ज की जाती है, ताकि व्यक्ति और संबंधित विभाग के बीच पारदर्शिता बनी रहे। यह नियम खासकर सरकारी और पीएसयू कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मूल सिद्धांत सभी पर लागू होता है—हर बड़ी प्रॉपर्टी डील को सही तरीके से दस्तावेज़ित और रिपोर्ट किया जाना चाहिए।
इस विषय के अचानक महत्वपूर्ण बनने का एक और कारण है वित्तीय सिस्टम का तेजी से आपस में जुड़ना। आज प्रॉपर्टी रजिस्ट्री, पैन रिकॉर्ड, टीडीएस फाइलिंग और बैंक ट्रांजैक्शन पहले से कहीं ज्यादा जुड़े हुए हैं। इससे सिस्टम पारदर्शी तो हुआ है, लेकिन कम्प्लायंस अब अनिवार्य हो गया है। जो चीजें पहले नजरअंदाज हो जाती थीं, अब वे ऑटोमेटेड अलर्ट के रूप में सामने आ सकती हैं।
यह गाइड इस पूरे विषय को आसान और व्यावहारिक भाषा में समझाने के लिए लिखी गई है। चाहे आप पहली बार घर खरीद रहे हों, प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हों या अपनी संपत्ति बेचने की योजना बना रहे हों, Immovable Property Intimation Form को समझना आपको कम्प्लायंट रहने, कानूनी परेशानियों से बचने और अपने रियल एस्टेट सफर को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ाने में मदद करेगा।
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Immovable Property क्या होती है?
भारतीय कानून के अनुसार, Immovable Property यानी अचल संपत्ति वह होती है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित (move) नहीं किया जा सकता। यह ऐसी संपत्ति होती है जो जमीन से स्थायी रूप से जुड़ी होती है और जिसका स्थान निश्चित होता है।
कानूनी रूप से अचल संपत्ति में निम्न प्रकार की संपत्तियाँ शामिल होती हैं:
Land / Plot (जमीन या प्लॉट) – किसी भी प्रकार की खाली जमीन या रेजिडेंशियल प्लॉट अचल संपत्ति की श्रेणी में आते हैं।
Flat / Apartment (फ्लैट या अपार्टमेंट) – बहुमंजिला इमारतों में बने रहने योग्य यूनिट्स भी अचल संपत्ति मानी जाती हैं।
House / Villa (मकान या विला) – स्वतंत्र मकान, डुप्लेक्स या विला सभी इस श्रेणी में शामिल होते हैं।
Commercial Property (व्यावसायिक संपत्ति) – दुकान, ऑफिस, शोरूम या किसी भी व्यवसायिक उपयोग की प्रॉपर्टी भी अचल संपत्ति होती है।
Agricultural Land (कृषि भूमि) – खेती के लिए उपयोग होने वाली जमीन भी कानूनी रूप से अचल संपत्ति मानी जाती है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो जो संपत्ति स्थायी रूप से जमीन से जुड़ी हो और जिसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता, वही अचल संपत्ति (Immovable Property) कहलाती है।
Intimation Form कब submit करना होता है?
Immovable Property Intimation Form आमतौर पर दो मुख्य परिस्थितियों में जमा किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रॉपर्टी से जुड़े सभी बड़े वित्तीय लेन-देन की जानकारी समय पर संबंधित विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज हो जाए।
प्रॉपर्टी खरीदने के बाद
जब कोई कर्मचारी नई प्रॉपर्टी खरीदता है—चाहे वह प्लॉट हो, फ्लैट हो या मकान—तो उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने विभाग या संस्था को इसकी सूचना देना आवश्यक होता है। इस सूचना में प्रॉपर्टी की कीमत, स्थान, खरीद की तारीख और भुगतान के स्रोत जैसी जानकारी शामिल की जाती है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि कर्मचारी की आय और उसकी संपत्ति के बीच पारदर्शिता बनी रहे।
प्रॉपर्टी बेचने के बाद
सिर्फ प्रॉपर्टी खरीदने पर ही नहीं, बल्कि प्रॉपर्टी बेचने के बाद भी यह फॉर्म जमा करना जरूरी होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी अचल संपत्ति बेचता है, तो उस बिक्री से प्राप्त धनराशि उसकी आय और टैक्स प्रोफाइल को प्रभावित करती है। इसलिए विभाग को इस लेन-देन की जानकारी देना अनिवार्य होता है, ताकि रिकॉर्ड अपडेट रहे और भविष्य में किसी प्रकार की कर या कानूनी जटिलता न उत्पन्न हो।
संक्षेप में, जब भी प्रॉपर्टी का स्वामित्व बदलता है—चाहे खरीद के माध्यम से या बिक्री के माध्यम से—तब Immovable Property Intimation Form जमा करना आवश्यक होता है।
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Form में कौन-कौन सी जानकारी भरनी होती है?
Immovable Property Intimation Form भरते समय प्रॉपर्टी से जुड़ी पूरी और सटीक जानकारी देना आवश्यक होता है, ताकि ट्रांजैक्शन का स्पष्ट और पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार हो सके। आमतौर पर इस फॉर्म में निम्न विवरण शामिल किए जाते हैं:
Buyer का नाम (खरीदार का नाम)
जिसने प्रॉपर्टी खरीदी है, उसका पूरा नाम और आवश्यक पहचान विवरण दर्ज किया जाता है।
Seller का नाम (विक्रेता का नाम)
जिस व्यक्ति या संस्था से प्रॉपर्टी खरीदी या बेची गई है, उसकी जानकारी भी देना जरूरी होता है।
Property का पूरा पता
प्रॉपर्टी का सही और पूरा पता, जैसे शहर, क्षेत्र, सोसायटी या प्लॉट नंबर आदि।
Property का प्रकार
यह बताना होता है कि प्रॉपर्टी किस श्रेणी की है—जैसे फ्लैट, प्लॉट, मकान या अन्य अचल संपत्ति।
खरीद मूल्य (Purchase Price)
प्रॉपर्टी किस कुल राशि में खरीदी गई, उसकी सटीक कीमत दर्ज की जाती है।
भुगतान का तरीका (Payment Mode)
भुगतान किस माध्यम से किया गया—जैसे होम लोन, बैंक ट्रांसफर, बचत या अन्य स्रोत।
रजिस्ट्रेशन की तारीख
जिस दिन प्रॉपर्टी की आधिकारिक रजिस्ट्री हुई, उसकी तारीख लिखना अनिवार्य होता है।
लोन की जानकारी (यदि होम लोन लिया हो)
यदि प्रॉपर्टी खरीदने के लिए बैंक से होम लोन लिया गया है, तो बैंक का नाम और लोन की राशि जैसी जानकारी भी शामिल की जाती है।
इन सभी विवरणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन पूरी तरह पारदर्शी और दस्तावेज़ों के अनुसार रिकॉर्ड में दर्ज रहे।
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Immovable Property Intimation Form क्यों ज़रूरी है?
Immovable Property Intimation Form केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आपकी वित्तीय पारदर्शिता और कानूनी सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसे जमा करने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण होते हैं, जिनमें से चार प्रमुख कारण नीचे दिए गए हैं:
टैक्स कम्प्लायंस सुनिश्चित करने के लिए
सरकार प्रॉपर्टी से जुड़े बड़े वित्तीय लेन-देन पर विशेष ध्यान देती है, क्योंकि यह सीधे आयकर और अन्य करों से जुड़ा होता है। जब प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन की जानकारी समय पर दी जाती है, तो यह सुनिश्चित होता है कि आपका टैक्स रिकॉर्ड सही और अपडेटेड रहे तथा भविष्य में किसी प्रकार की कर संबंधी समस्या न आए।
आय का सत्यापन (Income Verification)
प्रॉपर्टी खरीदना एक बड़ा निवेश होता है, इसलिए यह आवश्यक है कि आपकी घोषित आय और आपकी खरीदी गई संपत्ति के बीच संतुलन दिखाई दे। यह फॉर्म जमा करने से विभाग को यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रॉपर्टी खरीदने के लिए उपयोग किया गया धन वैध स्रोतों से आया है।
कानूनी सुरक्षा के लिए
भविष्य में यदि किसी प्रकार का विवाद या जांच होती है, तो यह दस्तावेज़ एक मजबूत प्रमाण के रूप में काम करता है। सही समय पर दी गई जानकारी आगे चलकर किसी भी कानूनी जटिलता से बचाने में मदद करती है।
विभागीय नियमों का पालन
सरकारी और पीएसयू कर्मचारियों के लिए अचल संपत्ति की जानकारी देना अनिवार्य होता है। यह उनकी वार्षिक संपत्ति घोषणा और सेवा नियमों का हिस्सा होता है। समय पर फॉर्म जमा करने से विभागीय नियमों का पालन सुनिश्चित होता है और अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना समाप्त हो जाती है।
अचल संपत्ति पर TDS (Section 194-IA)
हाल के समय में प्रॉपर्टी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय तेजी से चर्चा में है—अचल संपत्ति पर टीडीएस (Tax Deducted at Source)। आयकर अधिनियम की धारा 194-IA के अनुसार, यदि किसी प्रॉपर्टी की कीमत ₹50 लाख या उससे अधिक है, तो खरीदार को विक्रेता को भुगतान करते समय निर्धारित दर से टीडीएस काटना अनिवार्य होता है।
इस नियम के तहत खरीदार को कुल संपत्ति मूल्य का 1% टीडीएस काटकर सरकार के पास जमा करना होता है। यह प्रक्रिया इसलिए लागू की गई है ताकि उच्च मूल्य के प्रॉपर्टी लेन-देन पारदर्शी रहें और टैक्स से जुड़ी जानकारी सही तरीके से दर्ज हो सके।
सरल उदाहरण से समझें
मान लीजिए किसी प्रॉपर्टी की कीमत ₹70 लाख है:
प्रॉपर्टी की कुल कीमत: ₹70,00,000
1% टीडीएस: ₹70,000
विक्रेता को मिलने वाली राशि: ₹69,30,000
इस स्थिति में खरीदार ₹70,000 सरकार के खाते में टीडीएस के रूप में जमा करता है और शेष राशि विक्रेता को भुगतान करता है।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह टीडीएस जमा करना पूरी तरह अनिवार्य है। यदि इसे समय पर जमा नहीं किया जाता, तो जुर्माना और ब्याज लग सकता है। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदते समय इस नियम का पालन करना बेहद जरूरी है।
Property Return क्या होता है?
कुछ कर्मचारियों को हर वर्ष अपनी अचल संपत्ति से जुड़ी जानकारी अपने विभाग को घोषित करनी होती है, जिसे Property Return कहा जाता है। यह एक वार्षिक प्रक्रिया होती है जिसका उद्देश्य कर्मचारियों की संपत्ति का अद्यतन और पारदर्शी रिकॉर्ड बनाए रखना है।
Property Return में आमतौर पर निम्न जानकारी शामिल की जाती है:
Owned Properties (स्वामित्व वाली संपत्तियाँ) – वर्तमान में आपके नाम पर मौजूद सभी प्रॉपर्टी का विवरण।
Sold Properties (बेची गई संपत्तियाँ) – वर्ष के दौरान यदि कोई प्रॉपर्टी बेची गई है, तो उसकी जानकारी।
Newly Purchased Properties (नई खरीदी गई संपत्तियाँ) – वर्ष के दौरान खरीदी गई नई अचल संपत्ति का पूरा विवरण।
यह प्रक्रिया विभाग और कर्मचारी दोनों के लिए पारदर्शिता बनाए रखने में मदद करती है और भविष्य में किसी भी वित्तीय या कानूनी समस्या की संभावना को कम करती है।
यदि फॉर्म जमा नहीं किया जाए तो क्या हो सकता है?
यदि यह फॉर्म जमा करना अनिवार्य होने के बावजूद समय पर जमा नहीं किया जाता, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
विभागीय कार्रवाई (Departmental Action) – सेवा नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है, जिससे अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।
आय में असंगति का नोटिस (Income Mismatch Notice) – आय और संपत्ति के बीच अंतर पाए जाने पर आयकर विभाग नोटिस भेज सकता है।
टैक्स जांच (Tax Scrutiny) – प्रॉपर्टी से जुड़े लेन-देन की विस्तृत जांच शुरू हो सकती है।
इसीलिए यह बेहद जरूरी है कि जब भी यह फॉर्म जमा करना आवश्यक हो, इसे समय पर पूरा कर लिया जाए ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की परेशानी से बचा जा सके।
Step-by-Step Process (सरल तरीके से पूरी प्रक्रिया)
Immovable Property Intimation Form जमा करने की प्रक्रिया काफी सरल होती है। यदि आप नीचे दिए गए चरणों का सही तरीके से पालन करते हैं, तो यह काम आसानी से पूरा किया जा सकता है:
प्रॉपर्टी रजिस्ट्री पूरी करें
सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और सभी कानूनी दस्तावेज आपके पास उपलब्ध हैं।
Sale Deed की कॉपी तैयार रखें
रजिस्ट्री के बाद मिलने वाली सेल डीड (Sale Deed) इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। इसकी स्कैन कॉपी या फोटोकॉपी तैयार रखें।
भुगतान के प्रमाण संलग्न करें
प्रॉपर्टी खरीद के दौरान किए गए भुगतान का प्रमाण जैसे बैंक ट्रांसफर रसीद, चेक विवरण या अन्य वित्तीय दस्तावेज संलग्न करना आवश्यक होता है।
लोन से जुड़े दस्तावेज जोड़ें (यदि लागू हो)
यदि आपने होम लोन लेकर प्रॉपर्टी खरीदी है, तो बैंक द्वारा जारी लोन स्वीकृति पत्र और संबंधित दस्तावेज भी संलग्न करें।
विभाग के पोर्टल पर फॉर्म जमा करें
अंत में, अपने विभाग या संस्था के आधिकारिक पोर्टल पर लॉगिन करके Immovable Property Intimation Form भरें और सभी आवश्यक दस्तावेज अपलोड करके जमा कर दें।
इन सभी चरणों को पूरा करने के बाद आपकी प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1. Immovable Property Intimation Form जमा करने की समय सीमा क्या होती है?
आमतौर पर प्रॉपर्टी खरीदने या बेचने के 30 से 90 दिनों के भीतर यह फॉर्म अपने विभाग या संस्था में जमा करना होता है। सटीक समय सीमा विभाग के नियमों पर निर्भर करती है, इसलिए संबंधित विभाग के दिशानिर्देश जरूर देखें।
Q2. क्या निजी नौकरी करने वालों को भी यह फॉर्म भरना जरूरी है?
यह फॉर्म मुख्य रूप से सरकारी और PSU कर्मचारियों के लिए अनिवार्य होता है। हालांकि कुछ निजी कंपनियाँ भी Asset Declaration Policy के तहत कर्मचारियों से यह जानकारी मांग सकती हैं।
Q3. क्या ₹50 लाख से कम की प्रॉपर्टी पर भी Intimation Form देना पड़ता है?
हाँ, यदि आप सरकारी या संस्थागत कर्मचारी हैं, तो प्रॉपर्टी की कीमत चाहे कम हो या ज्यादा—खरीद या बिक्री की सूचना देना जरूरी हो सकता है। ₹50 लाख की सीमा केवल TDS (Section 194-IA) के लिए लागू होती है।
Q4. क्या प्रॉपर्टी गिफ्ट में मिलने पर भी Intimation Form देना पड़ता है?
हाँ। यदि आपको जमीन, फ्लैट या मकान गिफ्ट, विरासत (inheritance) या ट्रांसफर के रूप में मिलता है, तो कई विभागों में इसकी सूचना देना अनिवार्य होता है क्योंकि यह आपकी संपत्ति में वृद्धि मानी जाती है।
Q5. क्या यह फॉर्म ऑनलाइन जमा किया जा सकता है?
आज अधिकांश सरकारी विभाग और संस्थाएँ यह फॉर्म अपने आधिकारिक पोर्टल पर ऑनलाइन जमा करने की सुविधा देती हैं। आपको लॉगिन करके फॉर्म भरना होता है और आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने होते हैं।